Saturday, October 9, 2010

परिवर्तन


आज शाम थक हारकर
सारी कठिनाइयों को पार कर.
तैयार है बिस्तर,फिर तुझे खींचता 
गर्माहट से तत्पर,तेरी नींद को सींचता.


पर न जाने वह सपने इतनी पराये क्यों हो गए
जो बचपन में कभी मीठे हुआ करते थे.
वो किस्से-कहानियाँ इतने पराये क्यों हो गए
जो कभी चाकलेट-टाफी तो कभी परियों के देश से हुआ करते थे


यह परिवर्तन कुछ ठीक नहीं लगता
सोचकर यही तो हर शब् तू जगता.
कभी समय था-जब बिस्तर न छोड़ने के लिए दर्द पेट में अचानक उठता.
और अब समय है-की आत्मा के दर्द को तू महसूस नहीं कर सकता.


अब तो झूले और क्लास में बेंच की लड़ाई,
एक बड़ा रूप धारण कर हो गयी तेरे पद और पैसे की लड़ाई.
तभी तो अब इंसान ढूंढे नहीं मिलते,
नाम के साथ बस ओहदे टंगे मिलते.


यह क्या है और क्यों है,क्या तुझे समझ नहीं आता.
अपने ज़मीर को कुचलना बंद कर तू सुधर क्यों नहीं जाता.
अब क्या फायदा इस डांट का समय बदल गया है,
नहीं लायक तू इस कांट का तू दुनिया की दौड़ में ढल गया है.
या कहूं की तुम बड़े हो गए, समझने की शक्ति आ गयी है,
ये जटिल आत्मा लिए जो तुम खड़े हो गए,
यही  नासमझी तो तुम्हे खा गयी है.


अभी भी वक़्त है,तू इससे निकल सकता है.
तू भले ही इसमें विरक्त है,तू बदल सकता है.
जैसे छिले हुए घुटनों पर फिर मरहम लग सकता है.
किसी बच्चे से जाकर सीख,तू फिर इंसानियत में ढल सकता है.

3 comments:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (11/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  2. अच्छी प्रस्तुति ...बचपन भोला होता है ..समझदारी ही बेचैनियों को जन्म देती हैं

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  3. bohat bohat dhanyawaad aapka....
    main to bas apne vichaaron ko likhta hoon,
    aap sab ke aashirwaad se unmein khoobsoorti aur bhaav chamak uthte hain..........

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